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Delhi kidnapping cases दिल्ली में हो रहे किडनेपिंग के बारे में जाने क्या है वजह

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दिल्ली में लोगों के लापता होने की समस्या एक गंभीर विषय है। सरकारी आंकड़ों और रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली में हर साल हजारों लोग (विशेषकर बच्चे और महिलाएं) लापता होते हैं।

आंकड़े क्या कहते हैं?

दिल्ली पुलिस और ‘नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो’ (NCRB) के पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों के अनुसार:

दिल्ली में प्रतिदिन औसतन 50 बच्चे लापता होते हैं।

लापता होने वालों में महिलाओं और किशोरियों की संख्या भी काफी अधिक है।

2026 की शुरुआत एक चिंताजनक आंकड़े के साथ की: पहले 15 दिनों में ही 807 लोग लापता हो गए, जिनमें 509 महिलाएं और लड़कियां शामिल थीं — जो कुल मामलों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा है। इनमें से केवल 235 का ही पता लगाया जा सका, जिससे 572 लोग लापता रह गए। इनमें 191 बच्चे भी शामिल थे, जिनमें ज्यादातर किशोर लड़कियां थीं राहत की बात यह है कि दिल्ली पुलिस का रिकवरी रेट अन्य राज्यों के मुकाबले बेहतर है, लेकिन फिर भी एक बड़ा हिस्सा अनसुलझा रह जाता है।

बीते कई वर्षों में हुए लापता लोगों की सूची नीचे दिए गए है

मुख्य कारण

लोग किन परिस्थितियों में लापता होते हैं, इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं:

अपहरण और तस्करी (Trafficking): बच्चों और महिलाओं को अक्सर मजदूरी या अनैतिक कार्यों के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से ले जाया जाता है। कही हो रहे किडनेपिंग में सेक्स रैकेट्स का हाथ तो नहीं है या फिर ह्यूमन बॉडी ऑर्गन्स का तो नहीं

भटक जाना: छोटे बच्चे या मानसिक रूप से अस्वस्थ लोग अक्सर रास्ता भटक जाते हैं।

रोजगार का झांसा: कई बार युवाओं को नौकरी के बहाने दिल्ली बुलाया जाता है और फिर वे लापता हो जाते हैं।

सरकार और पुलिस के कदम

लापता लोगों को खोजने के लिए कुछ विशेष पहल की गई

Facial Recognition System (FRS): पुलिस अब सीसीटीवी फुटेज और लापता लोगों के डेटाबेस का मिलान करने के लिए इस तकनीक का उपयोग कर रही है।

TrackChild पोर्टल: केंद्र सरकार का यह पोर्टल लापता और पाए गए बच्चों के डेटा को ट्रैक करने में मदद करता है।

क्या करें अगर कोई लापता हो जाए?

अगर आपका कोई परिचित लापता होता है, तो ये कदम तुरंत उठाएं:

तुरंत नजदीकी पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज कराएं (सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, बच्चों के मामले में इसे सीधे अपहरण का मामला मानकर जांच होनी चाहिए)।

Zipnet (Zonal Integrated Police Network) पर जानकारी चेक करें।

सोशल मीडिया और स्थानीय समुदायों की मदद लें।

यह स्थिति चिंताजनक जरूर है, लेकिन जागरूकता और तकनीक के इस्तेमाल से रिकवरी की संभावनाएं बढ़ रही हैं।

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